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Sunday, 17 January 2016

स्वतंत्रता दिवस पर गीत

स्वतंत्रता दिवस पर गीत - मनोज शर्मा 'मधुर'
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दासता की प्रेतछाया  राष्ट्र से भगाना सीख लो ।
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

सोचना भी भूल है कि, हम सब स्वाधीन हैं
सोच के महल में हम आज भी पराधीन हैं
स्वार्थपरता के तेल को तिल-तिल बहाना सीख लो
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

विश्व के हृदय पटल पर आचरण का गुणगान है
चारण होना दरबार का, स्वाभिमान का अपमान है
मानवता के दीप को सूर्य -सा जलाना सीख लो
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

छोड़ो तेरा-मेरा करना, क्या रखा वैमनस्य में है
प्रगति का वांछित पथ तो, मित्रों सामंजस्य में है
सहभागिता के पुष्प को सुगंधित बनाना सीख लो
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

किसको मैं बाँधूगी राखी (रक्षाबंधन पर गीत)

किसको मैं बाँधूगी  राखी (रक्षाबंधन पर गीत)-मनोज शर्मा 'मधुर'
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 आया है रक्षाबंधन, घरों में बरस रहा कंचन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

प्यार के दो बोलों को सुनने, वर्षों आस लगाई
बहिना-बहिना कहने वाला, मिला न कोई भाई
रो-रो के पथराई आँखें, बहता रहा अंजन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

मन के सारे धन से मैंने, ले ली रेशम डोरी
और रखी फिर थाली में, चावल, हल्दी , रोरी
 द्वार को तकते-तकते मैं, खनकाती रही कंगन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

सखी-सहेली हैं जितनी , ज़ागीरें सबने पाईं
देख-देख अपने वीरा को, मन ही मन वे इतराईं
जलभुन जाये मेरा तन-मन, लहू करे   मंथन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

नववर्ष पर गीत



नगर -नगर में धूम मची है झूम रहा  गगन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

रिश्तों की नई पौध लगाने अन्तर्मन झकझोड़ दो
जीवन के बेसुध रथ को नई दिशा नया मोड़ दो
अतीत के पन्ने फाड़ के, करना फिर से हवन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

बुरी आदतें, बुरे मंसूबे आओ हम-तुम छोड़ दें
नशा भरा है जिस बोतल में , हाथ उसके  जोड़ लें
दुनिया में सबसे पूजनीय अपना चाल-चलन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

अपनी ख़ुशियों की कुछ फसलें मासूमों के घर रौंप  दो
 भूखे पेटों की ज़िम्मेदारी, अपने काँधों को सौंप दो
निष्ठुरता की सोच  का,  करना आज दमन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

Wednesday, 21 October 2015

उठो धरा के वीर-सपूतों, खाकी की शान बढ़ायें

उठो धरा के वीर-सपूतों, खाकी की शान बढ़ायें
कर्त्तव्य - पथ पे अनवरत,आगे हम बढ़ते जायें

डरे नहीं दुश्मन के आगे,लड़ के क़ुर्बानी  ठाने
देश का रक्षक हर पल अपना सीना  चौड़ा ताने
सब बाधाओं से डट के, अपना परचम लहरायें
उठो धरा के वीर-सपूतों, खाकी की शान बढ़ायें

अपने-पराये का भेद, न मन के अंदर उपजे
निष्ठा, त्याग, संकल्प का सिरमौर माथे पे सिरजे
छूते नहीं स्वाभिमान कभी भी, गौरव- गाथा दोहरायें
उठो धरा के वीर-सपूतों, खाकी की शान बढ़ायें
  
चोर-लुटेरों की गर्दन में, फंदा नागपाश का डालें
धूमिल कर दें  ज़ुल्मियत की, करतूतें और चालें
झिलमिल-झिलमिल न्याय का दीपक, नित हृदय में जलायें
उठो धरा के वीर-सपूतों, खाकी की शान बढ़ायें
 

Thursday, 8 October 2015

हिन्दी के ढ़ोल बजायें

हिन्दी के ढ़ोल बजायें (गीत)- मनोज शर्मा 'मधुर'
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उठो कलम के रहनुमाओं, मिलकर ज़ोर लगायें
नगरी-नगरी में हिन्दी के, आओ ढ़ोल बजायें

मम्मी, डैडी, अंकल, आंटी सब अंग्रेजी के रेले
 संस्कृति  की चूनर  से , जम के होली खेले 
हिन्दी की महत्ता का, जन-जन को पाठ पढ़ायें
उठो कलम के रहनुमाओं, मिलकर ज़ोर लगायें

रसवंती अपनी हिन्दी के, हम भूल रहे अफ़साने क्यों
पछुवा हवा के पीछे-पीछे,  बन बैठे दीवाने क्यों
स्कूलों में, कॅालेजों में,  फिर हिन्दी का अलख जगायें
उठो कलम के रहनुमाओं, मिलकर ज़ोर लगायें

हिन्दीवालों को क्या करना , क्या लिखा  अंग्रेजी में
अंग्रेजों का  जूता लटका, हमको दिखा  अंग्रेजी में
रंग-बिरंगे गमलों में नित, हिन्दी की पौध लगायें
उठो कलम के रहनुमाओं, मिलकर ज़ोर लगायें