Saturday, 23 January 2016

चलो वापिस चलें हम गाँव के लिए

चलो वापिस चलें हम गाँव के लिए
दो पेड़ नहीं शहर में छाँव के लिए

मशीनी घोड़ों की लत इस क़दर लगी
क़ुबूल नहीं  क़दम भर पाँव के लिए

कोई कब से नहीं आया है अपने घर
चलो कौआ तलाशें काँव के लिए

जिधर देखा, मिली है आग हर तरफ़
कहाँ से लाऊँ  गुलशन ठाँव के लिए

लगाना है, लगा घर अपना दाँव पे
वतन ज़ौजा नहीं सुन दाँव के लिए

मायने:  ठाँव के लिए-ठहरने के लिए, ज़ौजा-जोरू/पत्नी, गुलशन-बाग़

Sunday, 17 January 2016

स्वतंत्रता दिवस पर गीत

स्वतंत्रता दिवस पर गीत - मनोज शर्मा 'मधुर'
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दासता की प्रेतछाया  राष्ट्र से भगाना सीख लो ।
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

सोचना भी भूल है कि, हम सब स्वाधीन हैं
सोच के महल में हम आज भी पराधीन हैं
स्वार्थपरता के तेल को तिल-तिल बहाना सीख लो
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

विश्व के हृदय पटल पर आचरण का गुणगान है
चारण होना दरबार का, स्वाभिमान का अपमान है
मानवता के दीप को सूर्य -सा जलाना सीख लो
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

छोड़ो तेरा-मेरा करना, क्या रखा वैमनस्य में है
प्रगति का वांछित पथ तो, मित्रों सामंजस्य में है
सहभागिता के पुष्प को सुगंधित बनाना सीख लो
स्वतंत्रता के स्वर्ण- कलश को सर पे उठाना सीख लो ।

किसको मैं बाँधूगी राखी (रक्षाबंधन पर गीत)

किसको मैं बाँधूगी  राखी (रक्षाबंधन पर गीत)-मनोज शर्मा 'मधुर'
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 आया है रक्षाबंधन, घरों में बरस रहा कंचन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

प्यार के दो बोलों को सुनने, वर्षों आस लगाई
बहिना-बहिना कहने वाला, मिला न कोई भाई
रो-रो के पथराई आँखें, बहता रहा अंजन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

मन के सारे धन से मैंने, ले ली रेशम डोरी
और रखी फिर थाली में, चावल, हल्दी , रोरी
 द्वार को तकते-तकते मैं, खनकाती रही कंगन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

सखी-सहेली हैं जितनी , ज़ागीरें सबने पाईं
देख-देख अपने वीरा को, मन ही मन वे इतराईं
जलभुन जाये मेरा तन-मन, लहू करे   मंथन
किसको मैं बाँधूगी  राखी,  पूछ रहा नंदन

नववर्ष पर गीत



नगर -नगर में धूम मची है झूम रहा  गगन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

रिश्तों की नई पौध लगाने अन्तर्मन झकझोड़ दो
जीवन के बेसुध रथ को नई दिशा नया मोड़ दो
अतीत के पन्ने फाड़ के, करना फिर से हवन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

बुरी आदतें, बुरे मंसूबे आओ हम-तुम छोड़ दें
नशा भरा है जिस बोतल में , हाथ उसके  जोड़ लें
दुनिया में सबसे पूजनीय अपना चाल-चलन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

अपनी ख़ुशियों की कुछ फसलें मासूमों के घर रौंप  दो
 भूखे पेटों की ज़िम्मेदारी, अपने काँधों को सौंप दो
निष्ठुरता की सोच  का,  करना आज दमन है
नया साल है उमंग नई है नया खिला सुमन है

हाकिम अगर मग़रूर होता ही गया

हाकिम अगर  मग़रूर होता ही गया
सबके दिलों से  दूर होता ही गया

मुंसिफ़ ने अपनी आँखें जब से  मूँद लीं
ज़ुल्मो-सितम  भरपूर होता ही गया

इक बार मय जिसने चढ़ा ली शौक़ में
डेली  नशे  में  चूर  होता  ही  गया

भाषण के मीठे मुरमुरों को बाँटकर
इक मसखरा  मशहूर होता ही गया

इंसानियत की रेल जब-जब चल पड़ी
हासिल ख़ुदा  का नूर होता ही गया

उसने तो थूका और चाटा एक बार
दुनिया में फिर दस्तूर होता ही गया

सौंपा था हमने रहनुमा के हाथ में
जो आम, वो अमचूर होता ही गया

जब-जब चला लव का मधुर सिलसिला
 सबका हृदय  संतूर  होता ही  गया

मायने:- हाकिम- शासक, मग़रूर-अभिमानी, मुन्सिफ़-जज/ इंसाफ़ करने वाला, मसखरा-भाड़/विदूषक, रहनुमा- मार्गदर्शक, दस्तूर-चलन

उसे सोचा, उसे सिरजा, उसे पूजा गया हर पल

उसे सोचा, उसे सिरजा, उसे पूजा गया हर पल
किसी पत्थर, किसी बुत को ख़ुदा माना गया हर पल

कोई तो है सुनेगा जो सदायें उस इरम में से
भरोसे में गदागर को खड़ा पाया गया हर पल

अक़ीदत को, इबादत को क्यों न कहें रियाकारी
न कोई है, न कोई था किसे ढ़ूढ़ा गया हर पल

अज़ब तदबीर क़ायम है ज़मी को कब्ज़ करने की
कहीं मस्ज़िद, कहीं मंदिर बना डाला गया हर पल

क्या हिन्दू ? क्या मुस्लिम? फ़रेबी हैं , ज़रा सुन लो
कभी मतलब, कभी डर से, उसे पूछा गया हर पल

मायने: सिरजा-सृजन किया, इरम-कृत्रिम स्वर्ग, गदागर-याचक, अक़ीदत- आस्था, रियाकारी-पाखंड, तदबीर-युक्ति

चलता चल रहबर सड़क है अभी तक

चलता चल रहबर सड़क है अभी तक
तेरे ऊपर भी फ़लक है अभी तक

रौंदो मत, हमको उठा लो ज़मी से
सूखे फूलों में महक है अभी तक

अपने ज़ख़्मों को खुला तुम न रखना
सबके हाथों में नमक है अभी तक

आओ मिल-जुलकर जला दें महल सब
भूखे पेटों में दहक   है अभी तक

मन के पंछी तो उड़ेंगे गगन में
दुनिया में कितनी चमक है अभी तक

कैसे कह दें लब , ज़िगर का फ़साना
शबनम के आगे झिझक है अभी तक

कल ही तो  हम-तुम, मिले थे सफ़र में
फिर भी जाने क्यों कसक है अभी तक

मायने: रहबर-नेतृत्व करने  वाला/मार्गदर्शक , फ़लक-आसमान, कसक-टीस