Sunday, 17 January 2016

उसे सोचा, उसे सिरजा, उसे पूजा गया हर पल

उसे सोचा, उसे सिरजा, उसे पूजा गया हर पल
किसी पत्थर, किसी बुत को ख़ुदा माना गया हर पल

कोई तो है सुनेगा जो सदायें उस इरम में से
भरोसे में गदागर को खड़ा पाया गया हर पल

अक़ीदत को, इबादत को क्यों न कहें रियाकारी
न कोई है, न कोई था किसे ढ़ूढ़ा गया हर पल

अज़ब तदबीर क़ायम है ज़मी को कब्ज़ करने की
कहीं मस्ज़िद, कहीं मंदिर बना डाला गया हर पल

क्या हिन्दू ? क्या मुस्लिम? फ़रेबी हैं , ज़रा सुन लो
कभी मतलब, कभी डर से, उसे पूछा गया हर पल

मायने: सिरजा-सृजन किया, इरम-कृत्रिम स्वर्ग, गदागर-याचक, अक़ीदत- आस्था, रियाकारी-पाखंड, तदबीर-युक्ति

चलता चल रहबर सड़क है अभी तक

चलता चल रहबर सड़क है अभी तक
तेरे ऊपर भी फ़लक है अभी तक

रौंदो मत, हमको उठा लो ज़मी से
सूखे फूलों में महक है अभी तक

अपने ज़ख़्मों को खुला तुम न रखना
सबके हाथों में नमक है अभी तक

आओ मिल-जुलकर जला दें महल सब
भूखे पेटों में दहक   है अभी तक

मन के पंछी तो उड़ेंगे गगन में
दुनिया में कितनी चमक है अभी तक

कैसे कह दें लब , ज़िगर का फ़साना
शबनम के आगे झिझक है अभी तक

कल ही तो  हम-तुम, मिले थे सफ़र में
फिर भी जाने क्यों कसक है अभी तक

मायने: रहबर-नेतृत्व करने  वाला/मार्गदर्शक , फ़लक-आसमान, कसक-टीस
 

तेरे दिल की बंद खिड़की रोज़ खुलनी चाहिए

तेरे दिल की बंद खिड़की रोज़ खुलनी चाहिए
दुश्मनी की सब क़िताबें आज जलनी चाहिए

सींच दो मेरे लहू से आज उजड़े बाग़ों को
हो गईं जो ख़ुश्क कलियाँ फिर से खिलनी चाहिए

क़ैद कर लो गिरगिटों को जो करें गुस्ताख़ियाँ
इस चमन में तितलियाँ बेखौफ़  मिलनी चाहिए

रह भलें जाये अधूरी यार तेरी मन्नतें
पर इबादत की घड़ी दिन-रात चलनी चाहिए

क्या हुआ जो लड़खड़ा के आज फिर से गिर पड़े
कोशिशें तेरी मुसलसल रोज़ चलनी चाहिए

हो गयें छाले बहुत से देश के सुन पाँव में
इस सियासत की शुरू से नींव डलनी चाहिए

है अगर पत्थर ज़माना यार रहने दे उसे
पेड़ ऐसा बन, जहाँ को छाँव मिलनी चाहिए

मायने-   ख़ुश्क- सूखी हुईं , मुसलसल-लगातार,  बाग़-उद्यान

टूटे दिल का फिर से ठिकाना बना लो

टूटे दिल का फिर से ठिकाना बना लो
सामने जो आए  निशाना बना लो

सच कहोगे तो रूठ जाएगी दुनिया
 बेहतर है कोई बहाना बना लो

वस्ल के लम्हे होते हैं गुड़ से मीठे
हो सके जितना तुम ख़ज़ाना बना लो

हर तरफ़ चाहत की दुकानें खुली हैं
दिल के जज़्बातों को किराना बना लो

हर्फ़ जो भी आयें ख़यालों में तेरे
गुनगुनाओ उन्हें  तराना बना लो

मीर, ग़ालिब औ' फैज़ बैठे हैं सुनने
 अपना लहज़ा तुम शायराना बना लो

ज़ीस्त हो जाएगी मधुर एक दिन में
 रंजिशें छोड़ो दोस्ताना बना लो

मायने: वस्ल-मिलन, हर्फ़-शब्द/लफ़्ज़, ज़ीस्त-ज़िन्दगी , रंजिशें-मन-मुटाव/नाराज़ी

Saturday, 28 November 2015

ताज़ जिसको भी मिलेगा एक दिन

ताज़ जिसको भी मिलेगा एक दिन
फिर हवा में वो उड़ेगा एक दिन

बस अदब उसका यूँ ही करते चलो
काम तेरे वो करेगा एक दिन

डाल पे फल अपना पकने दो अभी
भाव उसका भी बढ़ेगा एक दिन

तू ज़रा नेकी का दामन थाम ले
साथ जग चलने लगेगा एक दिन

यूँ दरख़्तों को अगर काटोगे तुम
दम सभी का फिर घुटेगा एक दिन

ठोकरें उसको ज़रा खाने दे तू
घर को वो तब घर कहेगा एक दिन

क्या हुआ हारा ' मधुर' तू आज है
दौर तेरा भी चलेगा एक दिन

मायने: अदब-आदर/सत्कार, दरख़्त-पेड़

ज़हन में क्या घुल रहा आजकल

ज़हन में क्या घुल रहा  आजकल
ज़हर लफ़्ज़ों में मिल रहा  आजकल

गिला अब किसी ग़ैर से क्या करें
चराग़ों से घर जल रहा आजकल

रियाया को इतनी ख़बर ही नहीं
किसे उसका हक़ मिल रहा आजकल

सियासत तुझे होश भी है क्या
नशे में शहर चल रहा आजकल

जिसे प्यार में बाग़बाँ मिल गया
वही चेहरा खिल रहा आजकल

घटाओं से तेज़ाब गिरने लगा
 हरा रंग सब जल रहा आजकल

'मधुर' बेख़बर तू जिधर है खड़ा
महल कागज़ी हिल रहा आजकल

मायने- ज़हन/ज़ेह्न -सोच/चेतना, गिला-शिकायत, रियाया-प्रजा, बाग़बाँ-माली/बाग़ की देखभाल करने वाला

Sunday, 1 November 2015

मच्छर

मच्छर बैठा गाल पे, करता रहता प्यार
बार- बार बेकार है, गोरी की फटकार
गोरी की फटकार,लगी किन्तु वो न भागा
चिपट गया गाल से, सुई में ज्यों हों धागा
कहत मधुर देख यह,कि बाबा फूँको मंतर
बना दे इस मजनूँ को,एक छोटा सा मच्छर